Friday, June 10, 2016

सरकारों के विज्ञापनों की महत्ता और खर्चे का गुणा-भाग




आज कुछ सोशल मीडिया के पेज पर देखा कि दिल्ली सरकार के विज्ञापनों के खर्चे पर सवाल उठाये जा रहे हैं. तह में जाने पर पता चला कि दिल्ली सरकार ने पहली बार अपने बजट में विज्ञापनों पर खर्चे की सीमा 526 करोड़ तय करी थी किन्तु एक साल में 80 करोड़ से भी कम खर्च किया. इस खर्च में उन्होंने सभी तरह के विज्ञापन यानि कि प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, रेडियो एड आदि सब कुछ कर डाला और सिर्फ दिल्ली ही नहीं, दिल्ली के बाहर भी विज्ञापनों का खर्च इसी सीमा में कर डाला.

एक मित्र से चर्चा होने लगी. मित्र का विचार था कि दिल्ली के काम के प्रचार को दुसरे राज्य में क्यूँ किया जाए और आखिर इसमें दिल्ली के लोगों का पैसा क्यूँ खर्च किया जाए? अगर किसी सरकार को अपने सुशासन का प्रचार दुसरे राज्य में करना है तो पार्टी के पैसों से करो, जनता के टैक्स का पैसा क्यूँ इसमें खर्चा करना है?

सवालों में दम था, वैसे भी जिस जनता पर जमकर टैक्स पे टैक्स लादा जा रहा हो, उसके दिमाग में 'टैक्स का दुरूपयोग' शब्द कौंधते ही उसका बौखला जाना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है. पिछले दो सालों में वैसे भी केंद्र द्वारा टैक्स बढ़ाये जा रहे हैं और हर बचत योजना पर ब्याज कम करने की कोशिश हो रही है. इसके बाद तो जनता का गुस्सा होना स्वाभाविक ही था. तो मैंने सोचा कि इस बारे में 'मेरे विचार' क्या हैं, ये आप सभी तक पहुंचा देता हूँ.

पहली बार किसी सरकार ने अपने सभी तरह के विज्ञापनों के खर्चे पर एक सीमा तय करी है. इससे पहले की सरकारें बिना किसी बजट के और हर तरह के विज्ञापन को अलग मानकर खर्च करती आई हैं, और ये खर्चा अनुमानतः सालाना 1000 करोड़ रुपये से ज्यादा का होता था. अब क्यूंकि ये पहली बार हो रहा था इसलिए दिल्ली सरकार ने इस बजट की सीमा अपने अनुमानित खर्चे से कुछ ज्यादा यानि कि 526 करोड़ रुपये रखी थी. पहले साल में इस तय सीमा से बहुत कम यानि कि 80 करोड़ रुपये से भी कम खर्चा हुआ, इसलिए दुसरे बजट में इस सीमा को और कम करने की योजना है.

दूसरा मुद्दा था कि दिल्ली के काम का प्रचार दुसरे राज्य में क्यूँ किया जाए? मेरा इस विषय में ये मानना है कि कोई भी सरकार अगर कुछ अच्छा काम करती है तो उसे इसका प्रचार करने का पूरा हक है. संविधान उसे यह अधिकार प्रदान करता है. दिल्ली सरकार ने जिस तरह से आते ही जनता को बिजली के बिलों में राहत दी है, जीवनदायी पानी को मुफ्त दिया है, और अपने राज्य को प्रदुषण से मुक्त करने के लिए ओड-इवन  जैसी क्रांतिकारी योजनाओं को सफलतापूर्वक अंजाम दिया है, उसे इन कामों का प्रचार करना ही चाहिए. इसके अलावा दिल्ली सरकार की मोहल्ला क्लिनिक जैसी योजनाओं के चर्चे तो विदेशी अखबारों में भी हो रहे हैं तो इसका प्रचार अपने ही देश में करने में क्या बुराई है?

हमारे देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तो शपथ लेते ही दूसरे देशों के भ्रमण पर निकल गए थे. वहां पर उन्होंने बड़े बड़े रंगारंग कार्यक्रमों में अपनी और अपनी सरकार की तारीफों के पुल बाँध दिए. तब किसी ने उस विज्ञापन का खर्चा नहीं पूछा. तब किसी ने दूसरे देश में अपने देश के प्रचार का औचित्य नहीं पूछा. पहले भी सभी सरकारें अपना प्रचार दुसरे प्रदेशों के अखबारों में करती आई हैं, पहले कभी ये सवाल नहीं उठा तो आखिर अभी अचानक से सिर्फ आम आदमी पार्टी की सरकार के प्रचार पर ही सबको क्यूँ आपत्ति हो रही है? इसका सीधा सा उत्तर है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ अगर वास्तविक लड़ाई कोई लड़ रहा है तो वो है सिर्फ आम आदमी पार्टी की दिल्ली सरकार. और यही कारण है कि सभी लोग इस सरकार के काम-काज के प्रचार प्रसार को देश की बाकी जनता तक नहीं पहुँचने देना चाहते हैं. और यही कारण है कि मेरा मानना है कि दिल्ली सरकार अगर अपने यहाँ पर कुछ नए नए प्रयोग करती है और उन प्रयोगों में सफल रहती है तो उसे इसका प्रचार दूसरे प्रदेशों में भी करना ही चाहिए. जब दूसरे प्रदेशों के लोग दिल्ली में हो रहे विकास कार्यों को देखेंगे तो उनके अन्दर भी अपने प्रदेश में वैसे ही या उससे भी बेहतरीन विकास कार्यों के प्रति ललक उठेगी और वो लोग भी अपने प्रदेश की सरकार से अच्छा काम करने की अपेक्षा करेंगे और उस पर दबाव बनायेंगे.

एक और बात कि दूसरे प्रदेशों में दिल्ली के अच्छे कार्यों का प्रचार होने से दिल्ली की छवि और अच्छी होगी. निवेशक यहाँ पर निवेश के लिए लालायित होंगे और रोजगार के अवसर और बढ़ेंगे. दिल्ली के लोग जब दुसरे राज्य में जायेंगे तो वहां के लोगों के बीच में उनकी अच्छी छवि होगी.

दूसरा प्रश्न था कि दिल्ली के लोगों के टैक्स के पैसे से खर्च क्यूँ करना है, पार्टी के पैसों को खर्च क्यूँ नहीं करते इस काम में? इस प्रश्न पर थोड़ी देर के लिए मेरे दिमाग में भी सन्नाटा गूँज गया था. फिर मैंने सोचा कि पार्टी के पास पैसा कहाँ से आएगा? जनता से. और जनता तो काम देखकर या सुनकर ही आपको चंदा देगी. आम आदमी पार्टी तो वैसे भी जनता से ही चंदा लेती है अमीर व्यावसायिक घराने तो पार्टी को चंदा देते नहीं हैं, क्यूँकि ये पार्टी सिर्फ जनता के हित के ही काम करती है. इसलिए जिस जनता को आपका काम सुनाई या दिखाई नहीं देगा, वो जनता आपको चंदा क्यूँ देगी? तो दुसरे प्रदेशों की जनता से चंदा मिलना थोडा मुश्किल है. हाँ, दिल्ली की जनता जरुर ख़ुशी ख़ुशी इनको चंदा देगी, लेकिन तब भी तो यही सवाल खड़ा हो जायेगा न कि दिल्ली की जनता के चंदे को पार्टी दुसरे प्रदेश में क्यूँ खर्च कर रही है? एक पक्ष इस मुद्दे पर ये भी है कि अगर किसी प्रदेश में गठबंधन की सरकार हो तो उस सरकार के कामकाज के प्रचार प्रसार का जिम्मा कौन सी पार्टी उठाएगी? इसलिए मेरे हिसाब से ये प्रश्न ही बेमानी है.

इस पूरे मुद्दे पर सोचने वाली बात ये है कि आम आदमी पार्टी की दिल्ली सरकार ने जिस तरह से जनता की सुख सुविधाओं में अभूतपूर्व वृद्धि करने के बावजूद जनता का पैसा बचाया है और कई नए निर्माण कार्यों को पहले के मुकाबले में बहुत कम कीमत में तैयार किया है, उससे दिल्ली की जनता बहुत खुश है और यह सबसे बड़ा कारण है कि दिल्ली के टैक्स के पैसों पर होने वाले प्रचार का विरोध दिल्ली की जनता नहीं कर रही है बल्कि वो लोग कर रहे हैं, जिन्हें इस तरह की राजनीति के अपने प्रदेशों में आने का डर लग रहा है. उन्हें लग रहा है कि दिल्ली से शुरू हुई ये राजनीति अगर उनके यहाँ भी पहुँच गयी तो उनके भ्रष्टाचारी तौर तरीकों पर ग्रहण लग सकता है.

कुल मिलाकर इस मुद्दे पर मेरा विचार है कि किसी भी प्रदेश की सरकार को अपने अच्छे कार्यों की सफलता का उल्लेख करने की आज़ादी होनी चाहिए और अच्छे कामो का प्रचार प्रसार समाज को अच्छा ही बनाएगा.

टिप्पणी: चित्र में दिखाया गया विज्ञापन उस समय का है जब एंटी करप्शन ब्यूरो दिल्ली सरकार के अधीन थी, बाद में लगभग  चार महीने बाद ही केंद्र सरकार द्वारा एंटी करप्शन ब्यूरो को अपने अधीन कर लिया गया और उसके बाद से वहां किसी भी मामले का निपटान नहीं किया गया है. 

Wednesday, June 1, 2016

सेस की महिमा और देश में बढ़ते सेवा कर के पीछे का सच

आज यानि कि 1 जून, 2016 का दिन काफी गहमागहमी में चल रहा है. हर कोई सेस के बारे में बात कर रहा है. कारण है कि आज की तारीख से सभी प्रकार की सेवाओं पर पहले से चलते आ रहे सेवा कर में एक अतिरिक्त कर यानि कि टैक्स जोड़ दिया गया है. इस नए तरह के अधिभार को नाम दिया गया है 'कृषि कल्याण सेस'. 

कृषि कल्याण सेस - नाम सुनने से ही मन पावन पावन हो गया. बस ऐसा लग रहा है कि अभी जब मैं अपने मोबाइल का बढ़ा हुआ बिल जमा करूँगा तो उससे किसानों की आत्महत्या रुक जाएगी. ठीक वैसे ही जैसे लगभग छह महीने पहले इसी सरकार द्वारा लगाये हुए 'स्वच्छ भारत सेस' से मेरा देश पूरा स्वच्छ हो गया (मजाक है, क्यूंकि सब मजाक बन कर रह गया है). 

आखिर क्या कारण है कि स्वच्छ भारत सेस लगाने के समय पर जो लोग चुप रहे, वो भी अब अपनी आवाज मुखर करने लगे हैं? क्यूँ लोग किसानों का भला होने का अंदाजा देने वाले इस अधिभार पर विरोध के स्वर प्रकट कर रहे हैं?

इसका कारण है वर्तमान सरकार द्वारा देश को दिए गए भाषणों में सरकारी प्रगति की ऊंची ऊंची कहानियां सुनाना और उसके बावजूद भी बढती महंगाई से कोई राहत न दिलाते हुए रोज नए नए टैक्स बढ़ाना. 'स्वच्छ भारत सेस' के नाम से बटोरे गए धन का क्या उपयोग हुआ है, कहाँ गया ये पैसा, इन सवालों के जवाब जनता ढूंढ तो रही है लेकिन लगता है कि ये जवाब सर्फ एक्सेल से धुलकर गायब हो गए हैं. ढूंढते रह जाओगे वाला डायलॉग रह रह कर मन को कचोट जाता है.

देश में पिछले दो सालों में किसानों की हुई बदहाली और उनकी बढती आत्महत्याओं पर जब सरकार को घेरा जाने लगा है तो सरकार ने इसमें भी अपनी कमाई का जरिया निकाल लिया. अब कोई इस नए अधिभार का विरोध करे तो उसे किसान विरोधी घोषित कर दिया जायेगा. चित्त भी मेरी और पट भी मेरी. वाह जी वाह.

चलिए अब ये नया अधिभार लगाया है तो इसके पीछे कोई योजना तो होनी चाहिए थी किसानों की समृद्धि के लिए. फिर भी, अगर केंद्र सरकार अगले महीने से किसानों की होने वाली आत्महत्याओं पर रोक लगवा सके तो समझा जा सकता है कि हमारे पैसे से कुछ अच्छा काम हो गया. मुश्किल सिर्फ यही है कि इस सरकार ने पिछले 'स्वच्छ भारत सेस' से जनता को कोई भी ऐसा भरोसा दिलाया नहीं है. 

सेस के बारे में सोचते सोचते मुझे ये प्रश्न मन में कौंधा कि आखिर क्या कारण है कि भाजपा की वर्तमान सरकार को बार बार जनता पर नए नए टैक्स लगाने पर मजबूर होना पड़ रहा है? जब इस सरकार से सवाल पूछे जाते हैं तो आंकड़ों को इधर का उधर करके ये बता देते हैं कि देश की जीडीपी में अंधाधुंध वृद्धि हो गयी है. वो आंकड़े सुनते ही मन प्रफुल्लित हो जाता है. लेकिन जैसे ही वास्तविकता में अपने महीने का बढ़ा हुआ बजट और घटती हुई कमाई पर नज़र पड़ती है तो सारी ख़ुशी तुरंत उड़न-छू हो जाती है. दो साल पहले जब ये सरकार सत्ता में आई थी उस समय सेवा कर 12.5% था और आज की तारीख में ये बढ़कर 15% हो गया है. अगर इस देश की जीडीपी पिछले दो साल में इतनी ही तेजी से आगे बढ़ रही है तो फिर जनता पर 2.5% का अतिरिक्त टैक्स क्यूँ?

तब मुझे समझ में आया कि असल में इस सरकार के कार्यकाल में लोगों की कमाई घट गयी है, व्यापार में कमी आ रही है, और वास्तव में जीडीपी में कमी आ रही है, जिस वजह से सरकार को अपने कार्यकलापों को जारी रखने के लिए जरुरी धन की आपूर्ति इस तरह के अतिरिक्त टैक्स लगाकर करी जा रही है. सीधा सा गणित है कि अगर लोगों की कमाई बढ़ी होती तो अपने आप ही सरकार के पास उतने ही टैक्स में ज्यादा धन जमा होता लेकिन लोगों की कमाई कम होने के कारण ही सरकार को अपने खर्चों के लिए लोगों पर अतिरिक्त टैक्स का बोझ डालने पर मजबूर होना पड़ रहा है. 

देश के प्रधानमंत्री होने के नाते, मोदी जी का ये कर्तव्य है कि टैक्स देने वाली जनता पर इतना अधिक कर-भार डालने के बाद उन्हें अपने कामों में जल्दी ही परिणाम दिखाने चाहिए जो पिछले दो सालों में नदारद हैं. वर्ना तो जनता जनार्दन अगले चुनावों में आपको आपका रिजल्ट थमा ही देगी. 

Saturday, May 28, 2016

समीक्षा: मोदी सरकार के दो साल एक आम आदमी की नजर से

केंद्र सरकार अपने 2 साल पूरे होने का ढोल तो पीट रही है लेकिन जनता की कोई भी भागीदारी इस पूरे कार्यक्रम में कहीं नहीं दिख रही. कारण साफ़ है कि जनता इस तरह के कार्यक्रम में भागीदारी तभी करती है जब उसे सरकार से सीधे तौर पर किसी तरह का कोई फायदा हुआ हो.
सरकार नगाड़े बजाकर कह रही है कि उसने रोजगार दे दिया लेकिन जब उन्ही का नेता सुब्रह्मनियन स्वामी आरबीआई गवर्नर को हटाने के लिए कहता है कि देश में रोजगार नहीं है, कंपनियां घाटे में जा रही हैं तो कोई भी सरकार का मंत्री उठकर ये नहीं कहता कि ये आदमी झूठ बोल रहा है क्यूंकि उसे झूठा साबित करने के लिए उन्हें आंकड़े दिखाने पड़ेंगे.
आज अखबार में पढ़ा कि केनरा बैंक को कुछ हज़ार करोड़ का घाटा हुआ है, कुछ दिन पहले पंजाब नेशनल बैंक ने भी ऐसा ही घाटा प्रकाशित किया था. सरकार ना तो ललित मोदी का कुछ बिगाड़ पाई ना विजय माल्या का.
टीवी पर देखा कि छाती पीट पीट कर मोदी जी कह रहे थे कि 2 साल में उनकी सरकार पर भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं लग पाया.
अरे मोदी जी! आरोप लगाने के लिए जांच करने वाली सभी संस्थाओं पर तो आप ताला लगाकर बैठे हो. आरटीआई का क्या हाल हो गया है आपके राज में, किसी से छुपा है क्या? आरटीआई के जवाब देने के बजाय बीजेपी प्रेस कांफ्रेंस कर देती है पर आरटीआई का जवाब नहीं देती.
केंद्र का लोकपाल बिल पास हुए 2 साल से ऊपर हो गए लेकिन आज तक आपने उस पर किसी लोकपाल की नियुक्ति नहीं होने दी. दिल्ली सरकार ने अपना लोकपाल बिल राज्य से पास कर के केंद्र के पास 1 साल पहले भेज दिया, आप लोग उस के ऊपर भी पालती मारकर बैठ गए. दिल्ली सरकार से ACB भी छीन रखी है. मतलब न तो खुद भ्रष्टाचार के खिलाफ कुछ कर रहे हो न दूसरों को करने दे रहे हो.
वैसे भी आपकी सरकार ने कुछ काम किया हो तो ही लोग उसमे भ्रष्टाचार ढूंढ पाएंगे. काम के नाम पर आपने लोगों के 'जन-धन खाते' खुलवा दिए और बदले में गैस पे सब्सिडी धीरे धीरे ख़त्म कर दी, स्वच्छता के नारे दे दिए और बदले में स्वच्छ भारत टैक्स लगा दिया, किसानों की जमीन छीनने के लिए अधिग्रहण का अध्यादेश पे अध्यादेश लागू किया और जब जनता के भारी विरोध के कारण उसे वापस लेना पड़ा तो बदला लेने के लिए अब किसान के नाम से भी नया टैक्स चालू कर दिया.
दुनिया में कच्चे तेल की कीमतें आधे से भी कम हो गयीं पर आपने टैक्स पे टैक्स लगाकर पेट्रोल, डीजल के दाम दुगने कर दिए. आप महंगाई कम करने का नारा देकर सरकार में आये थे लेकिन आपके कार्यकाल में खाने पीने की वस्तुओं के दाम दुगुने से भी अधिक हो गए फिर भी कभी ऐसा सुनाई भी नहीं दिया कि आपने बढती हुई महंगाई से चिंतित होकर वित्त मंत्री से वार्तालाप किया हो.
काले धन का शोर चुनाव से पहले तक हमारे कान के परदे फाड़ता था लेकिन सत्ता में पहुँचने के बाद से आपने काला धन शब्द का जिक्र करना ही बेमानी समझ लिया. एक बार अपने 'मन की बात' कार्यक्रम में जरुर आपने इसका जिक्र किया लेकिन ये कहकर कि सरकार को पता ही नहीं है कि किसका और कितना काला धन विदेशों में जमा है. इससे पहले आप चुनावों में दुन्दुभी बजाकर कहते थे कि कुछ लोगों ने इतना काला धन विदेशों में जमा किया हुआ है कि उसको जब आप वापस लायेंगे तो हिंदुस्तान के एक-एक व्यक्ति को 15-15 लाख मिल जायेगा. चुनाव जीतने के बाद आप तो चुप्पी साध गए और आपके राष्ट्रीय अध्यक्ष ने इसे एक जुमला घोषित कर दिया.
चलिए चुनावी जुमलों को छोड़ दिया जाये तो भी आपके घोषणापत्र की तो अहमियत कम नहीं होनी चाहिए थी. लेकिन लगता है कि सत्ता लोलुपता में आपने और आपकी सरकार ने अपने ही घोषणापत्र को हाशिये पर धकेल दिया. न तो किसानों को उनकी फसल का उचित और लाभकारी मूल्य दिलवाने के लिए आपने कोई पहल करी बल्कि सर्वोच्च न्यायालय में ये कह कर कि सरकार ऐसी कोई योजना नहीं लाना चाहती है, आपने अपनी मंशा भी प्रकट कर दी.
विदेश नीति पर आते हैं तो मोदी जी ने आते ही धुआंधार विदेश यात्रायें करके और विदेशों में रंगारंग कार्यक्रमों के बीच भाषणबाजी करके सबको सम्मोहित तो कर दिया लेकिन अपने ही पडोसी देशों से धीरे धीरे सम्बन्ध खराब कर लिए.
चीन के राष्ट्रपति के साथ झूले पर बैठ कर पींगे बढाते रहे लेकिन चीन उसके बाद भी सीमा पर हमें आँखें तरेरता रहता है.
अचानक से बिना बुलावे के पाकिस्तान जाकर नवाज शरीफ के जन्मदिन का केक खा आये बिना अपने देश को सूचित किये, और इसके बावजूद भी पाकिस्तान से जारी हमलों पर चुप्पी साध ली. पठानकोट पर हमला हुआ, ये हमला पाकिस्तान ने करा था, इसके बावजूद आपने पाकिस्तान की ही जांच एजेंसी को बुलाकर अपनी बेइज्जती करवाई. उन्होंने उल्टा हमारे ही देश पर खुद पर ही छद्म हमला कराने का घिनौना आरोप लगा दिया और आप चुप रहे. ये कैसी राष्ट्रभक्ति है? एक समय हमारा मित्र देश कहलाने वाला छोटा सा पडोसी देश नेपाल आज बात बात पर हमको घुड़की दे रहा है और चीन के साथ व्यापारिक समझौते कर रहा है, ये आखिरकार किसका नुकसान है? हमारे देश का ही तो.
रक्षा मामलों में देखें तो आपने फ़्रांस की पहली यात्रा में ही राफेल फाइटर जहाजों की खरीद के लिए समझौते कर दिए और इसे बहु-प्रचारित भी कर दिया. तब से एक साल से ऊपर बीत गया है. न तो जहाज आये न जहाजों के पुर्जे. सुनने में आया है कि ऐसे महंगे जहाज खरीदने से पहले आपने रक्षा विशेषज्ञों से बातचीत करना भी मुनासिब नहीं समझा था, और अब रक्षा मंत्री इन जहाजो की कीमत दोगुनी महंगी बताकर इसे कम करवाने का प्रयास कर रहे हैं.
कुल मिलाकर अगर देखा जाए तो इन दो सालों में मोदी सरकार ने कोई भी सराहनीय कार्य नहीं किया है. और जैसा कि खुद भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने स्वीकार किया है कि पहले दो साल में नींव रखी गयी है और विकास के काम अब शुरू होंगे, तो मेरे हिसाब से अभी से 'विकास पर्व' मनाने का कोई औचित्य नहीं है.
पहले विकास कीजिये, उसके बाद 'विकास पर्व' मनाइए. तब जनता भी आपका साथ देगी.

Friday, August 7, 2015

शोले के सिक्के - संसद के पक्ष और विपक्ष

                     फिल्म शोले आपने जरुर देखी होगी। उसमे हीरो के पास एक अनोखा सिक्का था, जिसे उछाल कर वो अपनी और अपने साथ वालों की किस्मत तय किया करता था। इस सिक्के का अनोखापन ये था कि सिर्फ हीरो इस बात को जानता था कि सिक्का दोनों तरफ से एक जैसा ही है। इसलिए वो जैसा चाहता था, वही होता था।


                       जब से राजनीति समझनी शुरू करी थी, तब से देखता आया हूँ कि देश की संसद में पक्ष और विपक्ष कई मुद्दों पर आपस में लड़ते भिड़ते रहते हैं। फिर 5 साल के लम्बे इंतज़ार के बाद नए चुनाव होते देखा और पक्ष को विपक्ष में और विपक्ष को पक्ष में बदलते देखा। सोचा कि चलो अब जिस मुद्दे पर विपक्ष में बैठे लोग तन मन धन से लड़ रहे थे, अब वो मुद्दा उनके सत्ता में आने पर पर मूर्तरूप पायेगा। पर "ढिच्क्याऊँ" की एक आवाज के साथ गाना बजना शुरू होता है - 'गोली मार भेजे में'। ये क्या हुआ, कल तक विपक्ष में रहने वाली पार्टी जिस मुद्दे पर जी जान लगा रही थी, आज संसद के गलियारे में उस तरफ बैठते ही पलट गयी? ये क्या हुआ? कैसे हुआ? और हाँ, कल का सत्तापक्ष आज विपक्ष बनते ही उसी तरह का हंगामा करने लगा जिसके लिए वो कल तक पूर्व विपक्ष को कोसता रहता था।


                             खैर! धीरे धीरे समझ में आने लगा कि ये सब परंपरागत राजनीतिक पार्टियां कुछ और नहीं है, सिर्फ चन्द बड़े छद्म व्यापारियों के हाथ का खिलौना मात्र हैं। जनता को धोके में रखने के लिए विपक्ष में बैठी पार्टी किसी मुद्दे पर हंगामा जरूर करती है, लेकिन सत्ता मिलते ही वो अपने आराध्य छद्म व्यापारी के हाथ का खिलौना मात्र रह जाते हैं और फिर 'हुइए वही जो अम्बानी* रचि राखा'।


                        आज भी देश की संसद उसी ढर्रे पर चल रही है। सत्ता-पक्ष के मंत्रीगण करचोरी के मामले में भगोड़े का साथ दे रहे हैं, बलात्कारी लोग मंत्री बन रहे हैं और विपक्ष इन्ही मुद्दों पर संसद में हंगामा कर रहा है। इस्तीफे की मांग पर संसद आज भी ठप्प है। कल तक जो विपक्ष में रहते हुए हर दूसरे दिन प्रेस कांफ्रेंस कर के मंत्रियों का इस्तीफ़ा माँगा करते थे, आज वो खुद मंत्री बने हुए हैं और विपक्ष की मांग पर प्रेस कांफ्रेंस करके बता रहे हैं कि इस्तीफ़ा नहीं देंगे।


                        तो भाई! सीधी सी बात तो ये समझ में आई है कि वर्षों से जो पार्टियां एक बार सत्ता पक्ष के इस ओर दिखती हैं और दूसरी बार उस ओर, जब तक ये दोनों ही तरह की पार्टियां संसद से बाहर नहीं कर दी जातीं इनका ये खेल यूँ ही चलता रहेगा। ये हर बार जनता के सामने चुनावी सिक्का फेंकते रहेंगे लेकिन हकीकत में इस सिक्के के दोनों पहलु एक समान ही रहेंगे।

                         जरुरत है, तो सिक्का बदलने की।



*यहाँ अम्बानी एक प्रतीक मात्र हैं (ऐसे मिलते जुलते नाम वाले और भी हैं)।

Thursday, August 6, 2015

प्रधानमंत्री जी, आप देश चला रहे हैं, कोई आर एस एस की शाखा नहीं

माननीय प्रधानमंत्री जी,
        आज आपके नेतृत्व में देश आगे बढ़ रहा है लेकिन लग तो ऐसा ही रहा है कि जिस दिशा में आगे बढ़ रहा है वहां पर सामने आपातकाल बाहें फैलाए खड़ा है।  शायद इस पत्र के माध्यम से मैं आप तक कुछ मुद्दे पहुंचा सकूँ जिनकी वजह से आज देश को ऐसा प्रतीत हो रहा है।


        वर्षों के बाद ऐसा हुआ था कि देश ने किसी नेता पर भरोसा कर के पूर्ण बहुमत देकर देश का नेतृत्व करने का सौभाग्य आपको दिया। आपने देश को बहुत उम्मीदें भी दीं थी। आपने गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए अपने कार्यों का प्रचार-प्रसार जिस प्रकार से किया और उसके बाद अपनी चुनावी जनसभाओं में भाषण देने की अपनी कला का बखूबी प्रयोग करते हुए जनता को जिस प्रकार से 'सोने की चिड़िया' वाला भारत देश देने के और 'अच्छे दिन' लाने के जो वादे किये थे, उस सब से मंत्रमुग्ध होकर जनता ने आपको देश की संसद की बागडोर सौंप दी। लेकिन आप ने उसके बाद से देश को संघ की एक शाखा समझ लिया।


        प्रधानमंत्री जी, आप देश को 'अच्छे दिन' लाने का वादा करके सत्ता में आये थे।  ये वादा जनता ने माँगा नहीं था, आपने खुद ही ये सपना बुना था और जनता की आँखों के सामने एक मोहपाश की तरह से, एक चलचित्र की तरह से, इस सपने को अपनी भाषण कला में पिरोकर एक रोमांचक भविष्य देने का वादा किया था। इस सपने में कई दृश्य थे जैसे देश में बुलेट ट्रेन का आना, महंगाई में कमी लाना, किसानों को फसल की लागत मूल्य से 50% अधिक मुनाफा दिलाना, पूर्व सैनिकों को 'एक रैंक, एक पेंशन' देना, महिलाओं को सुरक्षा देना, और सबसे बढ़कर था काले धन को वापस लाना और भ्रष्टाचारियों को सजा दिलवाना चाहे वो आपकी ही पार्टी के क्यों न हों।


         प्रधानमंत्री जी, आपने इन सब कामों को करने के लिए समय सीमा भी खुद ही तय करी और कहा कि 'मुझे सिर्फ 60 महीने दे दो', जनता ने आपको दिल खोलकर 60 महीने दे दिए। आपने अपनी पार्टी के प्रचार में कहा कि 'आपका हर वोट सीधे सीधे मुझे मिलने वाला है' तो जनता ने आपके नाम पर अपराधी, बलात्कारी, चोर-उचक्के जिस जिस को भी आपकी पार्टी ने टिकट दिया, उसे जिता दिया। क्यों? क्यूंकि आपने वादा किया था कि आप 1 साल के अंदर-अंदर संसद को सभी दागियों से मुक्त करा दोगे और सबसे पहले अपनी पार्टी के ही लोगों पर आपका चाबुक चलेगा।


         प्रधानमंत्री जी, 1 साल पूरा हो गया।  आपने और आपकी सरकार ने जश्न भी मना लिया लेकिन संसद को दोष-मुक्त कराने का आपका वादा अभी तक पूरा नहीं हुआ। पुराने कर्मों को तो छोड़ भी दिया जाये, लेकिन आपके रहते हुए देश के कर-चोरी में लिप्त लोग आपके विदेश मंत्री से सीधे सीधे मदद पाते हैं और आप चुप रहते हैं? आपकी ही पार्टी की एक राज्य की मुख्यमंत्री उस कर-चोर के समर्थन में विदेशों में हस्ताक्षर कर आती हैं और आप चुप रहते हैं ? आपकी पार्टी के एक मुख्यमंत्री के राज में भ्रष्टाचार का खुलासा करने वालों की हत्या हो रही है और आप चुप रहते हैं? आपके मंत्रिमंडल में बलात्कार के दागी कैबिनेट मंत्री का दर्जा पाते हैं। आपके पूर्व रेल मंत्री के बेटे पर बलात्कार का आरोप लगता है और आप उस मंत्री को हटाने के बजाय कानून मंत्रालय में भेज देते हैं। यह तो कहीं से भी न्यायसंगत नहीं लगता।


             काला धन लाना तो बहुत दूर की बात है, देश की बागडोर सँभालने के बाद आपके मन की बात निकलकर बाहर आती है कि आपको पता ही नहीं है कि कितना काला धन देश के बाहर है? किसानों को उनकी फसल के मुआवजे में वृद्धि की आपने आस जगाई थी, उस पर आपकी सरकार ने विपरीत बयान दे दिया? चलिए कोई बात नहीं, इतने वर्षों से किसान सहते आ रहे थे, आपके राज के कुछ साल और सह लेते लेकिन आप तो उसके बाद उनकी जमीन हड़पकर व्यापारियों को देने के लिए इतने उतावले हो उठे कि जमीन अधिग्रहण के लिए अपार जन विरोध के बावजूद अध्यादेश पर अध्यादेश लाते रहे पूरे 1 साल तक? और अब जाकर आप थोड़े शांत हुए हैं। पता नहीं कि आपकी ये शांति कितने समय तक रह पायेगी क्यूंकि अगले साल के बाद आपके पास राज्यसभा में भी बहुमत होगा तब आप किस किस का विरोध देख पाएंगे और किसका नहीं, इस बारे में सोचने से ही मन शंकित हो जाता है।


               पूर्व सैनिक अभी तक आपके वादे के पूरे होने की आस में बैठे हैं, शंकित होने पर उन्होंने जंतर-मंतर पर धरना भी देना शुरू कर दिया लेकिन आज तक आप या आपके मंत्रिमंडल या आपकी पार्टी का कोई भी नुमाइंदा वहां पर पूर्व सैनिकों को दिलासा देने नहीं गया, क्यों? क्या देश की रक्षा के लिए अपनी जान की बाज़ी लगाने वाले इन सैनिकों का इस देश पर इतना भी हक़ नहीं कि उनकी समस्या पर उनसे बात कर ली जाये?


                  बुलेट ट्रेन तो छोड़िये, आपने आते ही रेल भाड़े में वृद्धि कर डाली, वो भी साल में 2 बार। चलिए माना कि सारी कड़वी दवाई जनता को ही पीनी है, लेकिन आश्चर्यजनक ये था कि ये किराये आपने हमेशा संसद सत्र से अलग समय में बढ़ाये जिसका कि आप पूर्ववर्ती सरकार के समय खुद विरोध करते रहे थे।


                  प्रधानमंत्री जी! आपने जो वादे किये थे, उन्हें तो आपकी पार्टी के अध्यक्ष ने चुनावी जुमला बताकर हमारी सारी आशाएं समाप्त कर ही दीं। लेकिन इन वादों पर मुकरने के अलावा आपकी सरकार एक और खतरनाक मार्ग पर चल रही है जिसका मकसद है हर आज़ादी पर प्रतिबन्ध लगाना।


                    सबसे पहले आपकी सरकार ने देश में काम करने वाले कई गैर-सरकारी संस्थाओं पर प्रतिबन्ध लगाना शुरू किया। इसके पीछे तर्क दिया गया कि इन संस्थाओं ने वित्तीय अनियमितताएं की हैं या इनको विदेशों से चंदा मिलता है और इसलिए ये संस्थाएं सरकार के विरुद्ध मुहिम चलाती हैं। लेकिन इन पर प्रतिबन्ध लगाने के अलावा आपकी सरकार ने ऐसा कुछ नहीं किया जिससे इनकी वित्तीय अनियमितता का मुआवजा भी देश के खजाने में आता।  ऐसा भी कुछ नहीं किया गया कि विदेशी इशारों पर चलने वाली संस्थाओं के मालिकों को देशद्रोह के मामले में जेल भेजा गया हो। तो इस से तो आपकी नीयत पर ही शक होने लगता है। लगता है कि आप प्रतिबन्ध की राजनीति करके देश को सिर्फ एक ही सन्देश देना चाहते हैं कि या तो मेरे साथ चलो नहीं तो दंड भुगतने को तैयार रहो। ये तो इस देश की संस्कृति नहीं रही है।


                    आपकी सरकार ने कभी फिल्मों पर तो कभी किताबों पर और कभी पोर्न देखने पर प्रतिबन्ध लगाकर अपनी संकीर्ण मानसिकता का ही परिचय दिया है। नैतिक शिक्षा पढ़ानी है तो प्रतिबन्ध लगाकर मत पढ़ाइये। ऐसा करके आप देश के लोगों की मानसिकता को अपना गुलाम बनाने की कोशिश करते हुए दिखते हैं। साफ़ साफ़ लगता है कि अब आप खुद को देश का नेतृत्व करने में अक्षम महसूस करने लगे हैं और इसलिए अपनी किसी बात को मनवाने के लिए आपको ऐसे छद्म रास्तों का सहारा लेना पड़ रहा है। ये सब रास्ते तो तानाशाही के ही दिखते हैं।


                    प्रधानमंत्री जी, फिल्मों में जैसे कोई खलनायक जब नायक से अपनी पसंद का काम नहीं करवा पाता है तो वो नायक के परिवार को कैद करके नायक पर दबाव बनाने की कोशिश करता है लेकिन उसी समय वो दर्शक के क्रोध का भागी बन जाता है। समझिए आप इस बात को कि प्रतिबन्ध लगाने से देश नहीं चलने वाला है। कम से कम भारत देश तो नहीं चलेगा। आप संघ की शाखा में जाकर इन प्रतिबंधों पर वाहवाही लूट सकते हैं लेकिन ध्यान रखियेगा माननीय प्रधानमंत्री जी! आप देश चला रहे हैं, कोई आर एस एस की शाखा नहीं। 

Monday, February 25, 2013

Voter registration goes online

   Hereby I am giving some details on how to register online as a voter in Karnataka (India). 


Main work: 
--> make your login --> Fill the form 6 --> submit the documents online --> get the printout of acknowledgement + DoB proof + Address proof --> send it to the AERO address mentioned in the acknowledgement form.

Requirements:

You just need 3 things in your computer/laptop.
1. your passport size photo in *.jpg format. (max size 50 kb).
2. Your Date of birth proof. (scanned/photo) in pdf format (max size 1 MB).
3. Your address proof (scanned/photo) in pdf format (max size 1 MB).

How to get the documents in desired format & size:

* To reduce the size of your photo with the help of 'Paint'. View the demo here: http://smartvote.in/demo/crop.htm

*To convert your documents in pdf, you can download & install cutepdf writer software (http://www.cutepdf.com/download/CuteWriter.exe & http://www.cutepdf.com/download/converter.exe).

*If you have your DoB / address proof in 2-3 pages, you can merge them into one pdf here : http://convert.neevia.com/pdfmerge/

*If the filesize of pdf is more than 1 MB, go to (http://convert.neevia.com/pdfcompress/) & set the 'compression preset to : Maximum compression.
Whom to contact in case of problem:

For any query/ problem faced in this, visit: www.smartvote.in
or call: 9019285666 / 9036000152

Dedicated to:

This post is dedicated to one of my friend +Nibha Saini , who continuously nagged me on how to register.  Thanks Nibha. :)

Saturday, June 16, 2012

My experience of Bangalore Graduate MLC election


No, I was not a candidate for this election. I was just supporting a candidate whom I believed that he could change the system if elected. Alas, that we lost the election but it taught me a lot of things about MLC & about preferential voting which I would like to share with everyone.
Here are some learning point by point:

What is an election: An election is a process where people are free to chose their leader. People exercise their vote & decide that which person shall hold the power to serve them better. The candidate who gets the majority votes, is called elected.

What is an MLC: MLC abbreviates for Member of Legislative Council (Vidhan Parishad). India has only 6 states which have Legislative Council apart from Legislative Assembly (Vidhan Sabha). In a simpler way, you can compare them as Loksabha & Rajyasabha in center. Interestingly, in contrast to Vidhan Sabha, Vidhan parishad can't be dissolved. Its members are elected to a term of 6 years in comparison to the 5 year term of MLA. The number of MLC in state can't be more than one third of MLA.

How an MLC is elected: MLCs are chosen in the following manner-

*One-third are elected by members of local bodies such as corporations, municipalities, and zilla parishads.
*One-third are elected by members of Legislative Assembly from among the persons who are not members of the Assembly.
*One-twelfth are elected by persons who are graduates of three years' standing residing in that state. (Graduate constituency)
*One-twelfth are elected by persons engaged for at least three years in teaching in educational institutions within the state not lower than secondary schools, including colleges and universities. (teacher's constituency)
*One-sixth are nominated by the governor from persons having knowledge or practical experience in fields such as literature, science, arts, the co-operative movement and social service.

What election was this: Bangalore is a Graduate MLC constituency where the Graduates can vote for their choice.

Enough about MLC. Tell me more about Preferential voting: This was not a normal election where people go & put a seal in front of the desired candidate's name. It was a preferential voting where you have to write 1,2,3... & so on according to your preference of the candidates. You must write 1 for the most preferred candidate of your choice then it's on you if you have other choices to write the next preference.

How the preferential votes are counted: This is interesting. In preferential voting a winner must be having 51% of the total valid votes.
First of all, all votes are counted for the 1st preference. If no one is having the desired 51% votes, then the candidate with least 1st preference votes is made out of the race & his voter's 2nd preference become the 1st preference & is added to that candidate's vote counts. This process continues until one candidate gets 51% of the total valid votes cast.
At last, if only 2 candidates remain & still no-one has the 51% votes, the winner is the one who gets maximum votes till this point.
(This condition came true in Bangalore MLC election as neither BJP nor JD(s) could get 51% votes so then by tally of total 1st preference votes  removing all other candidates, BJP won the election)

Why shall I vote? My single vote doesn't make a difference: This is a big myth in the youth thinking that they can't change the system solely. It becomes a problem when many of them has the same thinking. Oceans are made by drops.
When you crib about the system, corruption, infrastructure or inflation then you must think whether you did your own part to make it correct by casting your vote to the right person?


Tuesday, August 18, 2009

माई नेम इज खान

विगत कुछ दिनों से समाचार पत्रों मे एवं तथाकथित समाचार चैनलों मे एक समाचार बड़ी ही सुर्खियों मे है। और वो ये है कि हमारे देश के एक जाने-माने अभिनेता शाहरुख खान को अमेरिका के विमानन अधिकारियों ने २ घंटे तक रोक कर कड़ी पूछताछ करी। इस मामले को इतना अधिक तूल दिया जा रहा है कि लगता है कि जैसे अमेरिका ने हमारे देश पर हमला ही बोल दिया हो। जहाँ तक मेरा मानना है तो मुझे तो दाल मे काला नज़र आ रहा है। ख़ुद शाहरुख खान ने यह कहा है कि उनके नाम के पीछे खान होने की वजह से उनके साथ ऐसा बर्ताव किया गया है। जबकि अमेरिका के आव्रजन अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि उनके नाम की वजह से नही, बल्कि उनका सामान समय पर जांच के लिए ना पहुँचने के कारण उन्हें पूछताछ मे देरी हुई थी।


गौरतलब
है कि अभी कुछ ही समय मे शाहरुख़ खान एक चलचित्र मे अभिनय करते नज़र आने वाले हैं जिसका नाम है - ' माई नेम इज खान'। यह चलचित्र अमेरिका मे ट्विन-टावर्स के ध्वस्त होने के बाद की कहानी है कि किस प्रकार से अमेरिका मे इस घटना के बाद मुस्लिम नाम के लोगों को बिना वजह परेशान किया गया। अब जब कि ख़ुद शाहरुख़ खान को किसी और वजह से विमानपत्तन पर मुश्किल का सामना करना पडा तो उन्होंने इस मौके को भुनाने मे कोई कोर कसर नही छोडी और तुंरत वक्तव्य दे दिया कि मेरे नाम मे खान होने की वजह से मुझे परेशान किया गया। हर समाचार मे यह जुमला प्रचारित किया गया कि माई नेम इज खान। अच्छा खासा प्रचार हासिल करने का इससे सस्ता पर घटिया उपाय शायद ही कुछ और हो सकता हो। लोहा गरम है, जल्दी ही आप लोगों को इस चलचित्र के प्रचार देखने को मिल सकते हैं।

Tuesday, May 12, 2009

चुनावी गर्माहट


देश मे चुनाव का समय है केन्द्र मे हर व्यक्ति अपनी पसंद की सरकार देखने की इच्छा रखता है ये अलग बात है कि मतदान का प्रतिशत यही दर्शाता है कि इस साल भी लोगों ने अपनी इच्छाओं का गला घोंटने की जिद पकड़ी हुई है


ये गठबंधन राजनीति का दौर चल रहा है और हमारे कुछ दलों के नेताओं ने जनता को ऐसा बेवकूफ बना रखा है कि पूछो मत जनता को अगर पूछा जाए , अजी जनता को छोडिये इन नेताओं से ही अगर पूछा जाए कि चुनाव जीतने के बाद आप का दल किसे अपना समर्थन देगा तो सर खुजाते खुजाते नेताजी के बाल गिरने लगेंगे उत्तर प्रदेश का तो हिसाब साफ़ साफ़ है सपा और बसपा मे से एक दल जिसे समर्थन देगा, दूसरा दल उसके विरोधी को समर्थन देगा सपा तो इतना नीचे गिर चुकी है कि उसने साफ़ साफ़ कहा है कि जो भी सरकार उत्तर प्रदेश की मायावती सरकार को बर्खास्त करेगी, ये उसका समर्थन करेंगे. वाम दलों का भी हिसाब साफ़ है, उन्हें भी केन्द्र मे एक गैर-कांग्रेसी और गैर-भाजपा सरकार का निर्माण करना है पर जैसे जैसे चुनाव संपन्न होते जा रहे हैं, उनकी असलियत सामने आती जा रही है अब उन्होंने कांग्रेस की तरफ़ झुकना शुरू कर दिया है डर है कि कहीं झुकते-झुकते गिर जाएँ लालू प्रसाद, राम विलास पासवान और मुलायम सिंह एक साथ मंच पर खड़े होकर कांग्रेस को गालियाँ देते हैं फिर मंच से उतरकर कहते हैं कि कांग्रेस को ही समर्थन देंगे भोले भाले नागरिक का तो दिमाग ही घूम जाए ऐसी बातें सुनकर उत्तर प्रदेश और बिहार मे उन्ही के ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं और कहते हैं कि इन्ही की सरकार बनाने के लिए लड़ रहे हैं


भाजपा
को तो एक बार फिर से धोखा मिला है उडीसा मे नवीन पटनायक से दीगर बात ये है कि जब जब भाजपा ने धोखा खाया है, उसे जनता से समर्थन मिला है इस बार भी देखते हैं कि ये धोखा उनके लिए मतों मे तब्दील हो पता है या नही लेकिन इनके यहाँ भी वरुण गांधी सरीखे लोग जुबान पे घी लगा के आते हैं और जुबान फिसल जाती है राष्ट्रभक्ति दिखाना अच्छी बात है, पर कम से कम बिना बात के काटने - मारने की बातें तो मत करो मेरे भाई ऊपर से बहनजी ने भी अपने कदम कुछ ज्यादा ही हद तक बढ़ा दिए और उन पर रासुका लगा दी बाद मे अदालत मे सर नीचा करना पड़ा


खैर अभी तो चुनावी महासमर निपट चुका है और अब बारी है इंतज़ार कीइंतज़ार उस घड़ी का जिस वक्त यह पता चलेगा कि दौड़ मे बाजी किसके हाथ लगी हैउस घड़ी का, जब ये सभी दल अपना अपना मुखौटा उतार कर उस तरफ़ दौड़ लगायेंगे, जहाँ इन्हे दोनों हाथों मे लड्डू मिलेंगेउस घड़ी का, जब ये लोग जिनकी ऊँगली पकड़ कर चले हैं, उन्हें झटका देकर आगे निकल जायेंगे

Wednesday, July 23, 2008

सरकार की जीत या लोकतंत्र की हार?


संसद मे कल, यानी कि २२ जुलाई, २००८ को सरकार द्वारा विश्वास मत हासिल कर लिया गया। जाहिराना तौर पर यह वाम दलों की हठ-धर्मिता की हार है। लेकिन अचानक से एक वाकया ऐसा हुआ कि देश मे लोकतंत्र को शर्मसार होना पडा।



हुआ यूँ कि मतदान से कुछ घंटे पहले ही भाजपा के सांसद एक थैले मे करोड़ रुपये लेकर आए और सदन को यह बताया कि यह रूपया उन्हें सत्ता-पक्ष के सहयोगी द्वारा मतदान के समय पर अनुपस्थित रहने के लिए दिया गया अग्रिम मूल्य है। चूँकि विगत एक सप्ताह से विपक्ष सरकार पर
लगातार यह आरोप लगा रहा था कि उनके सांसदों को खरीदने की कोशिश की जा रही है, और सत्ता पक्ष बार बार साक्ष्य की मांग कर रहा था। ऐसे मे पूरे सदन के सामने, बल्कि पूरे देश के सामने जो यह साक्ष्य रखा गया है, उसने हमारे देश की इज्ज़त को मटिया मेट करना है, यह तय है।



यदि उन सांसदों को वास्तव मे ही यह धनराशि सत्ता पक्ष या उनके सहयोगी दलों के द्वारा दी गई है तो इस सरकार के लिए यह एक बार फिर से उसी प्रकरण की तरह का काला धब्बा साबित होगा जैसे कि पूर्व मे भी नरसिंह राव की सरकार ने सांसदों को खरीद कर अपने मुख-मंडल पर कालिख पोती थी। किंतु यदि यह कार्य उन सांसदों द्वारा स्वयं का रूपया लाकर किया गया है तो मेरे विचार मे इससे घटिया कार्य और कोई नही हो सकता है।



मजे की बात यह रही कि सरकार द्वारा अपने पक्ष मे जरूरी आंकडे जुटा लेने के बाद मे सुश्री मायावती का बयान आता है कि तो संप्रग और ही राजग यह चाहता है कि प्रधानमंत्री की कुर्सी पर एक दलित बैठे। अरे भाई! मेरा मतलब है कि बहन जी! यहाँ सारी कवायद चल रही थी परमाणु करार के मुद्दे पर सरकार द्वारा समर्थन जुटाने की, और आप हैं कि अपने को प्रधानमंत्री बनवाने के लिए इतनी उतावली हो रही हैं। और जहाँ तक दलित को प्रधानमंत्री बनाने की बात है तो मेरे विचार मे हमारे देश मे जब दलित राष्ट्रपति तक बन चुके हैं तो प्रधानमंत्री बनवाने मे किसी को भला क्यूँ दिक्कत होगी? लेकिन उसके लिए आपकी छवि भी तो अच्छी होनी चाहिए, क्यूंकि आप मुख्यमंत्री बनकर अपने विरोधी दलों को खुले-आम गालियाँ देती हैं तो कौन भला मानुष विदेशों से अपने संपर्क ख़राब करने के लिए आपको प्रधानमंत्री बनाना चाहेगा।



खैर, कुल मिला कर सरकार ने विपक्ष को तोड़ कर अपने पक्ष मे जरूरी संख्या बल तो दर्शा दिया है, किंतु असली अग्नि परीक्षा जो कि निकट भविष्य मे जनता के दरबार मे होने वाले चुनाव मे होगी, उसमे इस सरकार को और इस सरकार को समर्थन देने वालों को नंगे पैर चलना होगा।

Wednesday, July 2, 2008

एक प्रतिष्ठित चिकित्सक की सेवा-निवृत्ति


कल, यानि कि जुलाई, २००८ को डॉ पी वेणुगोपाल की देश के प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थान एम्स के निदेशक पद से सेवानिवृत्ति हो गई एक हृदय-चिकित्सक के रूप मे अपने कार्यकाल मे उन्होंने देश का नाम रोशन किया है यह बात दीगर है कि इसके लिए उन्हें कई बार काँटों भरी राह पर भी चलना पड़ा



केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री अम्बुमणि रामदास से आरक्षण के मुद्दे पर बढ़ा उनका टकराव इस हद तक पहुँच गया था कि सरकार ने उनको निदेशक पद से हटाने के लिए नए कानून तक बना डाले लेकिन अंत मे जीत सत्य की ही हुई जब माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार के उस कानून को गैर-कानूनी करार दिया और डॉ पी वेणुगोपाल की निदेशक पद पर दुबारा नियुक्ति हुई



इस सारे मामले मे यह देखना दिलचस्प रहा कि किस प्रकार से पूरा चिकित्सक समूह अपने निदेशक के साथ खड़ा नज़र आया पता नही क्यूँ स्वास्थ्य मंत्री ने यह सब देखते और जानते हुए भी सारी लड़ाई को व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का मुद्दा बना लिया और अपने साथ साथ केन्द्र सरकार को भी एक गैर-कानूनी कानून बनाने मे अपना भागीदार बना दिया



डॉ पी वेणुगोपाल ने देश को अपनी सेवाएं ऐसे समय मे दी जब उनके सामने अपना चिकित्सालय खोलने जैसे कई और विकल्प थे उनके साथ के चिकित्सक जिन्होंने विदेशों मे चिकित्सा अभ्यास करने को वरीयता दी, आज धनाढ्य वर्ग मे शामिल हैं, फिर भी डॉ पी वेणुगोपाल ने अपने देश मे ही रहकर यहाँ की जनता की मदद करने को हमेशा ही अपनी प्राथमिकता मे रखा आज वे भले ही एम्स से सेवा-निवृत्त हो गए हैं, लेकिन उनका योगदान कभी नही भुलाया जा सकताऐसे महान व्यक्ति को मैं शत-शत नमन करता हूँ।